बना कर फ़क़ीरों का हम भेस ‘ग़ालिब’
तमाशा-ए-अहल-ए-करम देखते हैं।
आया है बेकसी-ए-इश्क पे रोना ग़ालिब,
किसके घर जायेगा सैलाब-ए-बला मेरे बाद!
बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल है दुनिया मिरे आगे,
होता है शब-ओ-रोज़ तमाशा मिरे आगे।
ग़ालिब बुरा न मान जो वाइज़ बुरा कहे,
ऐसा भी कोई है कि सब अच्छा कहें जिसे।
यही है आज़माना तो सताना किस को कहते हैं,
अदू के हो लिए जब तुम तो मेरा इम्तिहाँ क्यूँ हो।
मिलना तिरा अगर नहीं आसाँ तो सहल है,
दुश्वार तो यही है कि दुश्वार भी नहीं।
ज़िंदगी यूँ भी गुज़र ही जाती,
क्यों तेरा रहगुज़र याद आया।
तिरे वादे पर जिए हम तो ये जान झूठ जाना,
कि ख़ुशी से मर न जाते अगर ए'तिबार होता।
जुदा थे हम तो मयस्सर थीं क़ुर्बतें कितनी,
बहम हुए तो पड़ी हैं जुदाइयाँ क्या क्या।