Home About Blog Videos

पहले से मरासिम न सही फिर भी कभी तो

रस्म-ओ-रह-ए-दुनिया ही निभाने के लिए आ

— अहमद फ़राज़

ज़िंदगी तेरी अता थी सो तिरे नाम की है

हम ने जैसे भी बसर की तिरा एहसाँ जानाँ

— अहमद फ़राज़

मुंतज़िर किस का हूँ टूटी हुई दहलीज़ पे मैं

कौन आएगा यहाँ कौन है आने वाला

— अहमद फ़राज़

मुद्दतें हो गईं ‘फ़राज़’ मगर

वो जो दीवानगी कि थी है अभी

— अहमद फ़राज़

तेरे बग़ैर भी तो ग़नीमत है ज़िंदगी

ख़ुद को गँवा के कौन तिरी जुस्तुजू करे

— अहमद फ़राज़

कितने नादाँ हैं तिरे भूलने वाले कि तुझे

याद करने के लिए उम्र पड़ी हो जैसे

— अहमद फ़राज़

फ़राज़’ तर्क-ए-तअल्लुक़ तो ख़ैर क्या होगा

यही बहुत है कि कम कम मिला करो उस से

— अहमद फ़राज़

न मंज़िलों को न हम रहगुज़र को देखते हैं

अजब सफ़र है कि बस हम-सफ़र को देखते हैं

— अहमद फ़राज़

अब और क्या किसी से मरासिम बढ़ाएँ हम

ये भी बहुत है तुझ को अगर भूल जाएँ हम

— अहमद फ़राज़

ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो

नश्शा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें

— अहमद फ़राज़

क़ुर्बतें लाख ख़ूब-सूरत हों

दूरियों में भी दिलकशी है अभी

— अहमद फ़राज़

अब तक दिल-ए-ख़ुश-फ़हम को तुझ से हैं उमीदें

ये आख़िरी शमएँ भी बुझाने के लिए आ

— अहमद फ़राज़

कितना आसाँ था तिरे हिज्र में मरना जानाँ

फिर भी इक उम्र लगी जान से जाते जाते

— अहमद फ़राज़

ढूँड उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती

ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें

— अहमद फ़राज़

गो नामा-बर से ख़ुश न हुआ पर हज़ार शुक्र

मुझ को वो मेरे नाम से पहचान तो गया

— दाग़ देहलवी

× popup image