मिलना तिरा अगर नहीं आसाँ तो सहल है,
दुश्वार तो यही है कि दुश्वार भी नहीं।
यानी: अगर तुझसे मिलना मुश्किल नहीं है, तो आसान भी नहीं है। मगर सबसे अजीब बात यह है कि न तो यह बिल्कुल नामुमकिन है और न ही इतना आसान कि बस हो ही जाए—इसी अनिश्चितता ने सबसे ज़्यादा तकलीफ़ दी है।
गहरी तशरीह: यह शेर मोहब्बत में अधूरेपन और इन्तिज़ार की उस अजीब कैफ़ियत को बयान करता है, जहाँ कोई पूरी तरह दूर भी नहीं होता, मगर पूरी तरह क़रीब भी नहीं आता। आशिक़ को अपने महबूब से मिलने की उम्मीद तो है, लेकिन यह उम्मीद इतनी मज़बूत भी नहीं कि उसे यक़ीन हो जाए। इस अधूरी उम्मीद की उलझन ही सबसे बड़ी तकलीफ़ बन जाती है।
मिसाल: जैसे कोई आशिक़ बरसों से अपने महबूब के लौटने की उम्मीद में बैठा हो, लेकिन यह न जानता हो कि वो लौटेगा भी या नहीं। अगर यह तय हो जाता कि वो कभी नहीं आएगा, तो दिल एक बार टूटकर सँभल जाता। और अगर यह यक़ीन होता कि वो ज़रूर आएगा, तो इंतिज़ार आसान हो जाता। मगर यह अनिश्चितता, यह “शायद” वाली कैफ़ियत, सबसे ज़्यादा दर्द देती है।