ग़ालिब बुरा न मान जो वाइज़ बुरा कहे,
ऐसा भी कोई है कि सब अच्छा कहें जिसे।
यानी: ऐ ग़ालिब, अगर कोई वाइज़ (धार्मिक उपदेशक) तुम्हें बुरा कहता है, तो इसे दिल पर मत लो। इस दुनिया में ऐसा कौन है जिसे हर कोई अच्छा कहे? किसी न किसी को तो शिकायत होगी ही।
गहरी तशरीह: यह शेर ग़ालिब की बेपरवाह और सूफ़ियाना सोच को बयान करता है। वह यहाँ यह कह रहे हैं कि दुनिया में हर इंसान की कोई न कोई आलोचना करता ही रहेगा। चाहे कोई कितना ही अच्छा क्यों न हो, सबको ख़ुश रखना नामुमकिन है। वाइज़ यानी वो लोग जो नैतिकता और धर्म के नाम पर दूसरों को जज करते हैं, अक्सर दूसरों की ज़िंदगी पर फ़ैसले सुनाने लगते हैं। लेकिन ग़ालिब यह कहकर उनकी परवाह न करने की सीख देते हैं।
मिसाल: जैसे कोई इंसान अपनी राह पर चलता रहे और कुछ लोग उसकी आलोचना करें, तो उसे उन बातों से घबराने की ज़रूरत नहीं। क्योंकि यह क़ायदा ही है कि दुनिया में सबको ख़ुश रखना मुमकिन नहीं। ग़ालिब हमें यह समझा रहे हैं कि आलोचना से डरने के बजाय, अपनी सोच और अपने फ़न पर यक़ीन रखना चाहिए।