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जुदा थे हम तो मयस्सर थीं क़ुर्बतें कितनी,
बहम हुए तो पड़ी हैं जुदाइयाँ क्या क्या।

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़


यानी: जब हम जुदा थे, तब भी हमारे बीच नज़दीकियों के एहसास बाकी थे—दिल में मोहब्बत थी, उम्मीद थी, एक क़रीबी रिश्ता था। मगर जब हम साथ आ गए, तब जुदाइयों की ऐसी दीवारें खड़ी हो गईं कि हर क़ुर्बत के बावजूद दूरियाँ बढ़ती चली गईं।


गहरी तशरीह: यह शेर मोहब्बत की उस तल्ख़ हक़ीक़त को बयाँ करता है जहाँ कभी-कभी फ़ासले क़ुर्बतों से ज़्यादा ख़ूबसूरत लगते हैं। जब दो लोग दूर होते हैं, तो मोहब्बत की शिद्दत बरकरार रहती है, दिल में एक तड़प और चाहत बनी रहती है। मगर जब वही लोग एक-दूसरे के करीब आ जाते हैं, तो हालात, अहंकार, या फिर इंसानी फ़ितरत की कमज़ोरियाँ ऐसी दूरियाँ पैदा कर देती हैं जो पहले नहीं थीं।


मिसाल: जैसे दो आशिक़ जब दूर होते हैं, तो एक-दूसरे की याद में तड़पते हैं, मोहब्बत गहरी लगती है, और हर चीज़ में एक हुस्न होता है। मगर जब वही दोनों पास आ जाते हैं, तो कभी ज़िंदगी की कड़वी हक़ीक़तें, कभी आदतों का टकराव, तो कभी हालात ऐसे बनते हैं कि पहले से ज़्यादा दूरियाँ पैदा हो जाती हैं। यानी कभी-कभी जुदाई में भी एक अनदेखी क़रीबी होती है, और क़रीबी में भी अनदेखी जुदाई।

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