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बना कर फ़क़ीरों का हम भेस ‘ग़ालिब’
तमाशा-ए-अहल-ए-करम देखते हैं।

मिर्ज़ा ग़ालिब


यानी: हमने अपना भेस तो फ़क़ीरों (दरवेशों) जैसा बना लिया है, लेकिन असल में हम देख रहे हैं कि ये दुनिया के दानी और साहूकार लोग कैसे बर्ताव करते हैं—यानी जिनके पास दौलत और इख़्तियार है, वो असल में कितने “करम” वाले हैं।


गहरी तशरीह: ग़ालिब यहाँ दुनिया की रियाकारी (दिखावे) पर एक तंज़ कर रहे हैं। वो कहते हैं कि उन्होंने ख़ुद को एक फ़क़ीर की तरह पेश किया, जैसे कि उन्हें दुनिया की किसी दौलत, शोहरत, या इनाम की चाह नहीं। लेकिन असल में वो इस भेस में एक तमाशबीन की तरह दुनिया को देख रहे हैं—ख़ासतौर पर उन लोगों को, जो ख़ुद को बड़े दरियादिल और सخی कहते हैं।

ग़ालिब शायद यह कहना चाहते हैं कि इस दुनिया में ज़्यादातर लोग जो नेकी और दरियादिली का दावा करते हैं, असल में दिखावे के लिए ऐसा करते हैं। अगर कोई हक़ीक़ी फ़क़ीर (यानी ज़रूरतमंद) उनके सामने आए, तो उनकी दरियादिली की सच्चाई सामने आ जाएगी।


मिसाल: जैसे कोई इंसान अमीरों के दरवाज़े पर फ़क़ीर बनकर जाए और देखे कि जो लोग दूसरों को दरियादिली और नेकी का सबक़ देते हैं, वही असल में ज़रूरतमंदों से मुँह मोड़ लेते हैं। ग़ालिब का ये शेर दुनिया की इसी सच्चाई को बेनक़ाब कर रहा है—जहाँ दरियादिली सिर्फ़ नाम की होती है, हक़ीक़त में नहीं।

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