बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल है दुनिया मिरे आगे,
होता है शब-ओ-रोज़ तमाशा मिरे आगे।
यानी: मेरे नज़रिए से यह दुनिया बस बच्चों का एक खेल का मैदान (बाज़ीचा) है, जहाँ हर रोज़ कोई न कोई तमाशा चलता रहता है। यह दुनिया और इसकी हलचलें मुझे सिर्फ़ एक खेल जैसी लगती हैं, जिसमें लोग आते हैं, जाते हैं, और अपने-अपने हिस्से का नाटक करके चले जाते हैं।
गहरी तशरीह: ग़ालिब यहाँ फ़ानी (नाशवान) दुनिया की हक़ीक़त को बयान कर रहे हैं। उनके नज़दीक यह दुनिया इतनी मामूली और खेल जैसी है कि इसमें जो भी उतार-चढ़ाव आते हैं, वो बस एक तमाशा लगता है। इसमें जो कुछ भी हो रहा है—लोगों की मोहब्बत, नफ़रत, जंग, दोस्ती, दौलत, और शोहरत—सब एक अस्थायी खेल से ज़्यादा कुछ नहीं।
यह शेर ग़ालिब की सूफ़ियाना सोच और उनकी ज़िंदगी के तजुर्बे का नतीजा है। उन्होंने दुनिया को इतनी क़रीब से देखा और समझा कि अब उन्हें यह गंभीर नहीं लगती, बल्कि बच्चों की खेल-तमाशे की तरह दिखती है, जिसमें हर कोई अपनी-अपनी भूमिका निभा रहा है।
मिसाल: जैसे कोई बुज़ुर्ग या तजुर्बेकार शख़्स किसी नौजवान को दुनिया की चीज़ों के लिए परेशान होते देखे और मुस्कुरा कर कहे—"ये सब तो आता-जाता रहेगा, तू क्यों इतना परेशान होता है?“ ग़ालिब का नज़रिया भी कुछ ऐसा ही है—उन्होंने दुनिया के बदलते मिज़ाज और लोगों के बदलते रंग देख लिए हैं, इसलिए अब इसे महज़ एक तमाशा समझते हैं।