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मत सहल हमें जानो फिरता है फ़लक बरसों

तब ख़ाक के पर्दे से इंसान निकलते हैं

मीर तकी मीर


मतलब :

हमें आसान मत समझो, हमारी क़ीमत को कमतर मत जानो। आसमान (फ़लक) बरसों तक घूमता रहता है, वक़्त की गर्दिशें चलती रहती हैं, तब कहीं जाकर ज़मीन की ख़ाक (मिट्टी) से कोई ऐसा इंसान पैदा होता है, जो वाक़ई कुछ मायने रखता है, जो अपनी मिसाल आप होता है। ऐसे लोग रोज़-रोज़ नहीं पैदा होते, सदियों में कभी कोई बेमिसाल शख़्स आता है।


तशरीह:

इस शेर में इंसान की क़ीमत, उसकी क़ाबिलियत और उसके अनमोल होने की तरफ़ इशारा किया गया है। शायर कहना चाहता है कि क़ाबिल लोग अक्सर कम होते हैं, और उनके पैदा होने के लिए वक़्त भी बरसों तक इम्तिहान लेता है।


मिसाल के तौर पर:

जिस तरह मीर, ग़ालिब, इक़बाल जैसे शायर बार-बार नहीं आते, सदियों में कोई एक ही ऐसा शायर पैदा होता है, जो अपने फ़न में बेमिसाल हो। इसी तरह, कोई बहुत बड़ा रहनुमा, कोई अज़ीम लीडर, कोई ईमानदार इंसान, या कोई बेहद हुनरमंद फ़र्द बरसों बाद पैदा होता है।

तो अगर तुम्हारे सामने कोई ऐसा शख़्स है, तो उसकी क़ीमत को समझो, उसे मामूली मत जानो।

क्यूँकि वो शख़्स उस ख़ाक से निकला है, जिसके लिए फ़लक ने बरसों इंतेज़ार किया है।

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